
अस्तित्व
(मेरी अंतरंग की रचना में)
रचनात्मक अंतरंग के अस्तित्व में
अस्तित्व की खोज करता हूँ..
अस्तित्व में मैं मेरे अस्तित्व की खोज करता हूँ...
भटकते मन की चंचलता को परिसिमित कर..
द्वेषपूर्ण मौन को शिथिल करता हूँ..
अस्तित्व में मैं मेरे अस्तित्व की खोज करता हूँ...
अपरिचित भय को दुरलक्षित कर..
सवालों के आगमन को आश्वस्त करता हूँ..
अस्तित्व में मैं मेरे अस्तित्व की खोज करता हूँ...
दुर्बल विरोध का अभिसाक्षी बन..
विरोध के परिवेश में ढलता हूँ..
अस्तित्व में मैं मेरे अस्तित्व की खोज करता हूँ...
अपराजित विनय को अलंकृत कर..
अंतरंग की उपलब्धता को सुशोभित करता हूँ..
अस्तित्व में मैं मेरे अस्तित्व की खोज करता हूँ...
..प्रतीक
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